फाँस उपन्यास में कर्ज से ग्रस्त किसान जीवन की त्रासदी
पवित्रा
पीएच॰ डी॰ श¨धार्थी, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, र¨हतक (हरियाणा)
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
।ठैज्त्।ब्ज्रू
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ अधिकांश आबादी गाँव में निवास करती है अ©र गाँव के ल¨ग¨ं का मुख्य कार्य कृषि है। किसान पर हमारी अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। फिर भी किसान¨ं क¨ उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। आदि काल से लेकर उŸार आधुनिक काल तक किसानपिसता आ रहा है। आज भी खेती सरकार की दृष्टि में न के बराबर है। जिसके कारण किसान कर्ज में डूब जाता है अ©र आत्महत्या करने क¨ मजबूर ह¨ जाता है। किसान कर्ज से ग्रस्त ह¨कर त्रासदी पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू अर्थव्यवस्था, नीतियाँ, सब्सिडी, कर्ज, उत्पादन, त्रासदी।
प्रस्तावना:
देश की आबादी क¨ 70 साल ह¨ने क¨ है। देश में तेजी से विकास ह¨ रहा है अ©र नई-नई तकनीकी ल¨ग¨ं क¨ आकर्षित कर रही है। आज भले हीभारत मीडिया अ©र राजनेताओं के कहे अनुसार ह¨ गया है,परन्तु जब हम किसान¨ं क¨ आत्महत्या करते हुए देखते हैं, रिक्शा चलाते मजदूर¨ं क¨ देखते हैं, त¨ लगता है- बदलाव अ©र विकास की बातें राजनीति का मुद्दा भले ही हो,परन्तु ल¨ग¨ं के जीवन में परिवर्तन नहीं कर सका।
यह निर्विवाद सत्य है कि भारत प्राचीन काल से कृषि प्रधान देश रहा है। भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर ही आधारित है,परन्तु सत्य यह है कि कृषि से जुड़ा हुआ किसान आज अपनीपूर्वावस्था से अधिक दयनीय स्थिति में जी रहा है। शायद ही ऐसा क¨ई दिन ह¨गा, जहाँ समाचार पत्र¨ं में कृषक आत्महत्याओं का उल्लेख नहीं ह¨। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है, हालात ऐसे उत्पन्न ह¨ गए हैं कि सभी व्यवस्थाएँमजबूत ह¨ती जा रही है अ©र वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस द©र में किसानीव्यवस्था ही हाशिए पर ढ़केल दी गई है अ©र किसान कर्ज से ग्रस्त ह¨कर त्रासदी का जीवन व्यतीत कर रहा है।
भूमंडलीकरण अ©र अ©द्य¨गिक विकास की इस भागम-भाग में किसान¨ं की निरंतर उपेक्षा, किसान¨ं का किसानी से पलायन, आत्महत्या का भयावह आँकड़ा केवल एक समस्या नहीं है, बल्कि भावी भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है। इस चेतावनी क¨ ’प्रेमचंद’ के बाद किसी ने समझा त¨ वे हैं- कथाकार संजीव। ऐसे में कथाकार ’संजीव’ पाँच साल के गहन श¨ध एवं अथक परिश्रम से देश के किसान¨ं की समस्याओं, आत्महत्याओं की इस सतत्त्रासदी पर ’फँास’ जैसा उपन्यास लेकर सामने आते हैं एवं इस पूरे प्रकरण की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिकपेंचीदगियों की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए भारत के इस ज्वलंत अ©र बुनियादी समस्या क¨ सशक्त रूप से उठाते हैं। ’फँास’ की कहानी आंरभ ह¨ती है। विदर्भ के यवतमाल जिले के बनगाँव के एक किसान परिवार शिबू अ©र शकून तथा उनकी द¨ बेटिय¨ं की अपनी दुःख-तकलीफ¨ं, सपन¨ं की दुनिया से अ©र धीरे-धीरे किसान¨ं के जीवन के कई अंधेरे-उजाले क¨न¨ं में झाँकते हुए आगे बढ़ती है।
हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। विडंबना यह है कि सुबह से शाम खेती के लिए अपना ह¨म करने वाले किसान¨ं क¨ पेट भरने के लिए दो जून की र¨टी नसीब नहीं ह¨ती। कृषि उनके लिए गले की फाँस बन गई है, जिसे ये न त¨ अपनी प्रवृŸिा अ©र मजबूरी के कारण छ¨ड़ पाते हैं अ©र न ही इसमे खुष रह पाते हैं। ये प्रवृति और मजबूरियाँ अनेक हैं, जिन्हें हम इस उपन्यास में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। किसान¨ं के खेती न छोड़ पाने के द¨ कारण हैं- एक कृषि दासता, त¨ दूसरा अन्य क¨ई विकल्प न ह¨ना। शिबू अपनी इसी मजबूरी क¨ बयां करता है-’’अकेला ह¨ता त¨ चला भी जाता कहीं नागपुर, नासिक, मुंबई, दिल्ली, लेकिन ये द¨-द¨ मुलगियाँ, बायन¨ं। इन सबक¨ लेकर कहाँ जाऊं।’’1 इसके जवाब में कलावती कहती है-’’तुम ही नहीं, इस देश के सौ में से चालिस शोतकरी, आज ही खेती छ¨ड़ दे, अगर उनके पास क¨ई दूसरा चारा ह¨ अ©र अस्सी लाख ने त¨ किसानी छ¨ड भी़ दी।’’2 आगे किसानी मानसिकता क¨ बयां करते हुए कलावती कहती है-’’एक विद्वान ने कहा है कि खेती क¨ई धंधा नहीं, बल्कि एक लाइफ़स्टाइल है, जीने का तरीका, जिसे किसान अन्य किसी भीधंधे के चलते नहीं छ¨ड़ सकता।’’3 तरक्की अ©र विकास के तमाम दाव¨ं के बावजूद किसान आज विपन्न है अ©र कर्ज के ब¨झ अ©र प्रकृति की मार ने उसे आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया है और 1990 के दषक के बाद से यह आँकड़ा बढ़ता ही चला जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आँकड़¨ं के अनुसार-’’भारत भर में 1965 ई॰ से 2011 के बीच 17 वषर्¨ं में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसान¨ं ने आत्महत्या की है। भारत में धनी अ©र विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र मेंअब तक आत्महत्याओं का आँकड़ा50 हजार, 830 तक पहुँच चुका है। 2011 में मराठावाड़ा में 435, विदर्भ में 226 और खान देष (जलगाँव क्षेत्र) में 133 किसान¨ं ने आत्महत्याएँ की है। आँकड़े बताते हैं कि 2004 के पष्चात स्थिति बद से बदतर ह¨ती चली गई। 1991 और 2001 की जनगणना के आँकड़¨ं क¨ तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि किसान¨ं की संख्या कम ह¨ती जा रही है। 2001 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि पिछले 10 वषर्¨ं में 70 लाख किसान¨ं ने खेती करना बंद कर दिया। 2011 के आँकड़े बताते हैं कि 5 राज्य¨ं क्रमषः महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश अ©र छŸाीसगढ़ में 1534 किसानअपने प्राणों का अंत कर चुके हैं।’’4
आज कॉरप¨रेट सेक्टर सरकार के बीच संबंध पहले से ज्यादा मजबूत ह¨ गया है। 1990 के आस-पास से ही बाजारवादीशक्तिय¨ं क¨ खुली छूट मिलने लगी।इन शक्तिय¨ं का एकमात्र उद्देश्य है- लाभ कमाना। फाँस उपन्यास बार-बार इस सत्य क¨ स्थापित करता है अ©र मनरेगा आदर्श ग्राम य¨जना आदि पर सीधी च¨ट करते हुए सरकार की नीतिय¨ं का पर्दाफाश करता है। सरकार जनता क¨ लुभाने के लिए ढेर सारी य¨जनाएँ बनाती है, पर सच्चाई त¨ यह है कि न त¨ वह जमीनी हकीकत से जुड़ी हैं, न किसान¨ं की बुनियादी समस्याओं से। प्रश्न त¨ यह है कि संपूर्ण ग्रामीण र¨जगार य¨जना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वर¨जगार, मनरेगा, प्रधान मंत्री ग्राम¨दय जैसी किसान¨न्मुखी की य¨जनाओं के बावजूद किसान क्य¨ं आत्महत्या करने पर विवश है ? इसका सीधा जवाब यह है कि यह य¨जनाएँकिसान¨ं क¨ ध्यान में रखकर बनायी ही नहीं गई। इसका सीधा लाभबिच©लिय¨ं क¨ मिलता है।जिसमें कृषि के नाम पर ऋण देने वाला बैंक, सेठ, साहूकार, महाजन,यहाँ तक कि पुलिस अधिकारी सभी आतें है।
प्रेमचंद के समय से किसान¨ं की समस्या उठी। पहले जमीदार लूटते थे, अब य¨जनाओं की आड में चेहरे बदलती सरकारें। य¨जनाएँ त¨ बनती है, पर किसान¨ं के लिए नहीं, अपने फायदे के लिए, ताकि इन्हें दिखा कर व¨ट बट¨रे जा सकें अ©र विर¨धी पार्टी पर तंज कसा जा सके। ’फाँस उपन्यास’ में नाना कहता है-’’किसान¨ं के नाम पर अरब¨ं रुपए लूटना है त¨,’कृषक आत्महत्या’, अपनी चीनी मिल लगाने का बहाना ढूँढना हैत¨,’कृषक आत्महत्या’ विर¨धी पार्टी को ठगना है तो ’कृषक आत्महत्या’ बहुत कारगर है। कृषक आत्महत्या तो घंटे-घंटे ड्रेस बदलने वाली गृहमंत्री, कर¨ड़¨ं-अरब¨ं में खेलने वाले राजनेता, फिल्मी ल¨ग, दलाल, व्यापारी, क्रिकेट और बिल्डर्सइनके लिए खेल ह¨ गई। 3 लाख किसान¨ं की आत्महत्या ! बर्फ के ग¨ले-सा उठा-उठाकर मारते हैं, एक दूजे पर। आरोप छर्र ! सफाई छर्र।’’5 दिल्ली की संसद में बैठकर य¨जनाएँ बना लेने वाली सरकार के कई प्रतिनिधि नेताओं क¨ खेती के बारे में साधारण-सीबातें मालूम नहीं।’फाँस’ का पात्र विजेन्द्र कहता है-’’कई नेता त¨ जानते भी नहीं कि आलू ऊपर फैलता है या नीचे, खेती धान की ह¨ती है, चावल की नहीं। सरपत अ©र गन्ने प©धे में क्या फर्क है।’’6 सरकारी दबाव में या यूँ कहें चुनाव के बदले कर्ज माफ करने की घ¨षणा भी करती है, पर अफस¨स यह कर्ज माफी भी एक छलावा है। क्य¨ंकि पहली बात त¨ बैंक ऋण बहुत कम देता है। खेती के लिए ल¨न लेना है, त¨ पहले अपना सब कुछ बेचकर बीज खरीद¨, खेती से संबंधित व्यवस्था कर¨, तब कहीं जाकर ल¨न कीआशा रख¨। जाधव बैंक की नीति क¨ उजागर करते हुए कहता है-’’हम ल¨ग सभी जगह गए थे, कहीं से ल¨न-व¨न नहीं मिला। बोले हीर¨ ह¨ंडा लेना है, त¨ ब¨ल¨। खेती के लिए कितना ल¨न मिलेगा ?’’7
भारतीय किसान कर्ज में ही जन्म लेता है,कर्ज में ही मरता है। ज¨ धीरे-धीरे उन्हे आत्महत्या की अ¨र ले जाती है। पर अफस¨स की बात है कि आई॰ एम॰ एस॰ के इशारे पर चलने वाली सरकार, कृषि विर¨धी है। यही कारण है कि खेती में सब्सिडी देने के बदले कर्ज का मकड़जाल फैलाती है, जिसमें बेचारा किसान फँसता चला जाता है। संजीव ने उपन्यास में कई बार अन्य देश¨ं के उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया है कि किसान¨ं क¨ सब्सिडी मिलनी चाहिए। ’खेतिहर संकट’ लेख में भी यही बात कही गई है-’’सुविधाएँ भी उन्हें नहीं मिल रही। भारत में किसान¨ं क¨ सब्सिडी दी जाती है, लेकिन ’आॅर्गेनाइजेशन फाॅर यूर¨पियन इक¨नॉमिक कॉरप¨रेशन’ के देश¨ं में किसान क¨ जितने सब्सिडी हासिल है, उसकी तुलना करें त¨ पता चलेगा कि भारत में किसान¨ं क¨ मिलने वाली सब्सिडी, इन देश¨ंके किसान क¨ मिलने वाली सब्सिडी के सतांश भी नहीं है। भारत के प्रति किसान सब्सिडी 66 डाॅलर है, जबकि जापान में 26 हजार डाॅलर, अमेरिका में 21 हजार डाॅलरअ©र आॅर्गेनाइजेशन फॉर यूर¨पियन इक¨नॉमिक्स कोआॅपरेशन के देश¨ं में 11 हजार डाॅलर।’’8
ल¨कतंत्र का च©था स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी आज सफलता व लाभ के भँवर में ऐसा फँसा है कि उसे किसान¨ं की आत्महत्या की खबरें महज एक हेडलाइन से ज्यादा कुछ नहीं लगती। किसान, मजदूर कभी खबर के केंद्र में नहीं है। केंद्र में त¨ राजनीति, नेता, कलाकार आदि की खबरें। संजीव ने अपने उपन्यास में जगह-जगह ये बातें उठाई हैं-’’मीडिया की हजार-हजार आत्महत्याएँ क¨ई खबर नहीं बन पाती। खबर बनती है, मुंबई में चल रहे ’लैक्मे फैशन वीक की प्रतिय¨गिता’। 512खबरिया चैनल जुटे हैं, उसे कवर करने क¨ मात्र 512 ......।’’9
आलम यह है कि 1970 में मजदूरी अ©र टीचर का वेतन लगभग एक समान था। आज शिक्षक¨ं का वेतन बढ़ गया। यही नहीं राजनेताओं की भी तनख्वाह की बात कही जाए त¨ वह आसमान छू रही है, पर अफस¨स की बात है, किसान मजदूर की स्थिति वैसी हीरह गई है। यह अन्तर भयावह है।उपन्यास में इसी सत्य क¨ उद्घाटित करते हुए आंध्र का एक किसान प्रतिनिधि कहता है-’’नए मुख्यमंत्री क¨ कृषक आत्महत्याओं की क¨ई चिंता नहीं, जबकि एम॰एल॰ए॰ की तनख्वाह 95 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने जा रहे हैं, किसान त¨ हर तरफ से ठगे गए।’’10
’सेवासदन’ के चेतू से लेकर ’ग¨दान’ केहोरी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं, बल्कि एक हत्या है, जिसके जिम्मेदार सिर्फ अ©र सिर्फ हमारी व्यवस्था है। ’’सरकारी नीतियाँ, बैंक¨ं की पॉलिसी, उद्य¨गपतिय¨ं की स्वार्थ भावना, म©सम की प्रतिकूलता आदि ऐसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से किसान¨ं के जीवन में दुःख¨ं का अम्बार टूट पड़ता है अ©र वे आत्महत्या करने के लिए विवश ह¨ जाते हैं।’’11
निष्कर्ष:
हम कह सकते हैं कि फाँस को पढ़ना आज के समय में देश की सबसे बड़ी अवसाद पूर्ण किसान आत्महत्या से परिचित ह¨ना है। यह उपन्यास ऐसे विषयों को सामने लाता है, जिसे हम लगातार अनदेखा कर देते हैं। उदारीकरण के बाद हमारी सरकारें किसके हित में काम कर रही हैं, यह स्पष्ट ह¨ जाता है। यह उपन्यास उन सभी आत्महत्याओं का साक्षी बनकर आता है, जिनके परिवार अपने परिजन¨ं क¨ ख¨ने के बाद तौबा कर लेते हैं, कृषि नहीं करेंगे। आजादी के पहले से बने ये समस्याएँ आज राजनैतिक अ©र भ्रष्टाचार के कारण नासूर बन गई है, जिनका इलाज असम्भव सा लगता है। ये समस्याएं एक चेतावनी है, जिससे पता चलता है कि यदि हालात न बदले त¨ ऐसा समय भी आएगा, जब दुनिया का हर आदमी उपभ¨क्ता ह¨गा, वह अपने मनपसंद की क¨ई भी कीमत देने क¨ तैयार ह¨गा, पर पैदा करने, उपजाने वाला क¨ई न ह¨गा।
’’न तू जमीं के लिए है, न आसमां के लिए,
तेरा वजूद है अब सिर्फ दास्तां के लिए।’’
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. संजीव, ’फाँस’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण (2015), पृष्ठ संख्या:17
2. वहीं, पृष्ठ संख्या: 17
3. वहीं, पृष्ठ संख्या: 17
4. थ्ंतउमते ेनपबपकम तंजमे ेवंत ंइवअम जीम तमेज पी॰ साईनाथ, द हिंदू अभिगमन, तिथि 21 अक्टूबर,2013
5. संजीव, ’फाँस’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण (2015), पृष्ठ संख्या: 153
6. वहीं, पृष्ठ संख्या: 109
7. वहीं, पृष्ठ संख्या: 47
8. भ्जजचरूध्ध्ूूूण्नउजबींदहमण्वतहध्ीपदकपध्खेतिहर संकट-70 ीजउब
9. संजीव, ’फाँस’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण (2015), पृष्ठ संख्या: 183
10. अग्रवाल प्रम¨द कुमार, भारत के विकास की चुन©तियाँ, ’’भारतीय कृषि ल¨कभारती प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण (2013),पृष्ठ संख्या:37-38
11. संजीव, ’फाँस’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण (2015), पृष्ठ संख्या: 153
Received on 02.01.2019 Modified on 19.01.2019
Accepted on 13.03.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):263-266.